अयोध्याकाण्ड · दोहा 218 · दोहा/सोरठा
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।
अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु।।218।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.218 · पुस्तक पृ. 524, 525
भावार्थ और शब्दार्थ
1मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।
हे देवराज, रघुश्रेष्ठ राम के भक्त का अहित मन में भी मत लाओ।
English explanation
O king of the gods, do not even entertain the thought of harming a devotee of Rama, foremost of Raghu’s lineage.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मनहुँ | मन में भी | even in your mind |
| न | मत | do not |
| आनिअ | लाओ; विचार करो | bring; entertain |
| अमरपति | हे देवताओं के राजा इंद्र | O Indra, king of the gods |
| रघुबर | रघुकुल में श्रेष्ठ राम के | of Rama, foremost of Raghu’s lineage |
| भगत | भक्त का | a devotee’s |
| अकाजु | अहित | harm |
2 अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु।।218।।
ऐसा करने से अपयश, इस लोक और परलोक में दुःख तथा दिन-प्रतिदिन शोक का अंबार होगा।
English explanation
Doing so will bring disgrace, suffering in this world and the next, and an ever-growing burden of sorrow.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अजसु | अपयश | disgrace |
| लोक | इस लोक में | in this world |
| परलोक | परलोक में | in the next world |
| दुख | दुःख | suffering |
| दिन | दिन | day |
| दिन | प्रतिदिन | after day |
| सोक | शोक का | of sorrow |
| समाजु | समूह; अंबार | mass; accumulation |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 218
- स्रोत अभिलेख
- 2.218
- सहायक विषय
- इन्द्र-बृहस्पति-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 524, 525
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।