अयोध्याकाण्ड · दोहा 219 · दोहा/सोरठा
राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल।।219।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.219 · पुस्तक पृ. 525, 526
भावार्थ और शब्दार्थ
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1राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
राम के भक्त दूसरों के हित में लगे रहते हैं, दूसरों के दुःख से दुःखी होते हैं और दयालु होते हैं।
English explanation
Devotees of Rama are devoted to others’ welfare, grieve at others’ suffering, and are compassionate.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम के | of Rama |
| भगत | भक्त | devotees |
| परहित | दूसरों के हित में | in others’ welfare |
| निरत | लगे हुए; तत्पर | devoted; engaged |
| पर | दूसरों के | others’ |
| दुख | दुःख से | at suffering |
| दुखी | दुःखी होने वाले | grieving; sorrowful |
| दयाल | दयालु | compassionate |
2 भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल।।219।।
हे देवराज इंद्र, भक्तों में श्रेष्ठ भरत से मत डरो।
English explanation
O Indra, ruler of the gods, do not fear Bharata, the foremost of devotees.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भगत | भक्तों में | among devotees |
| सिरोमनि | शिरोमणि; सर्वश्रेष्ठ | crown jewel; foremost |
| भरत | भरत; राम के भाई | Bharata, Rama’s brother |
| तें | से | of; from |
| जनि | मत | do not |
| डरपहु | डरो | fear; be afraid |
| सुरपाल | हे देवताओं के पालक इंद्र | O Indra, protector of the gods |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 219
- स्रोत अभिलेख
- 2.219
- सहायक विषय
- इन्द्र-बृहस्पति-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 525, 526
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