अयोध्याकाण्ड · दोहा 308 · दोहा/सोरठा
भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।
भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।
सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल।।308।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.308 · पुस्तक पृ. 601, 602
भावार्थ और शब्दार्थ
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1भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।
समस्त शुभ मंगलों के मूल, भरत और राम के संवाद को सुनकर—
English explanation
Hearing the dialogue between Bharata and Rama, the source of all auspicious blessings—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत का | of Bharata |
| राम | राम के साथ | with Rama |
| संबादु | संवाद | dialogue |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| सकल | समस्त | all |
| सुमंगल | शुभ मंगलों का | of auspicious blessings |
| मूल | मूल स्रोत | source |
2 सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल।।308।।
अपने हित की चाह रखने वाले देवता उनके कुल की सराहना करके कल्पवृक्ष के फूल बरसाते हैं।
English explanation
The gods, seeking their own interests, praise their lineage and shower flowers from the celestial wish-fulfilling tree.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुर | देवता | the gods |
| स्वारथी | अपने हित के इच्छुक | seeking their own interests |
| सराहि | सराहकर | having praised |
| कुल | उनके कुल को | their lineage |
| बरषत | बरसाते हैं | shower |
| सुरतरु | कल्पवृक्ष के | of the celestial wish-fulfilling tree |
| फूल | फूल | flowers |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 308
- स्रोत अभिलेख
- 2.308
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 601, 602
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