अयोध्याकाण्ड · दोहा 225 · दोहा/सोरठा
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।
कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु।।225।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.225 · पुस्तक पृ. 530, 531
भावार्थ और शब्दार्थ
1भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।
उस समय भरत का प्रेम जैसा था, वैसा वर्णन शेष भी नहीं कर सकते।
English explanation
Even Shesha cannot describe Bharata’s love at that moment exactly as it was.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत का | Bharata’s |
| प्रेमु | प्रेम | love |
| तेहि | उस | that |
| समय | समय | moment |
| जस | जैसा था | as it was |
| तस | वैसा | just so |
| कहि | वर्णन कर | describe |
| सकइ | सकते हैं | can |
| न | नहीं | not |
| सेषु | शेषनाग भी | even Shesha, the serpent deity |
2 कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु।।225।
वह प्रेम कवि की अभिव्यक्ति से परे है, जैसे अहंता और ममता से मलिन लोगों के लिए ब्रह्मानंद अगम है।
English explanation
That love lies beyond the poet’s expression, just as the bliss of Brahman is beyond people tainted by ego and possessiveness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कबिहिं | कवि के लिए | for the poet |
| अगम | पहुँच से परे | beyond reach |
| जिमि | जैसे | just as |
| ब्रह्मसुखु | ब्रह्म का आनंद | the bliss of Brahman |
| अह | अहंता, मैं का भाव | ego, the sense of ‘I’ |
| मम | ममता, मेरा का भाव | possessiveness, the sense of ‘mine’ |
| मलिन | मलिन | tainted |
| जनेषु | लोगों में अथवा लोगों के लिए | among or for people |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 225
- स्रोत अभिलेख
- 2.225
- सहायक विषय
- भरतजी चित्रकूटके मार्गमें
- मुद्रित पृष्ठ
- 530, 531
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।