अयोध्याकाण्ड · दोहा 224 · दोहा/सोरठा
तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।
तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।
राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ।।224।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.224 · पुस्तक पृ. 529, 530
भावार्थ और शब्दार्थ
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1तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।
उस दिन ठहरकर वे प्रातः ही रघुनाथ का स्मरण करते हुए चल पड़े।
English explanation
After staying there that day, they set out early the next morning, remembering Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेहि | उस | that |
| बासर | दिन | day |
| बसि | ठहरकर | having stayed |
| प्रातहीं | प्रातः ही | early in the morning |
| चले | चल पड़े | set out |
| सुमिरि | स्मरण करके | remembering |
| रघुनाथ | रघुकुल के स्वामी राम को | Rama, lord of Raghu’s lineage |
2 राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ।।224।।
साथ के सभी लोगों को भरत के समान ही राम के दर्शन की लालसा थी।
English explanation
All those accompanying Bharata longed to see Rama just as Bharata did.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम के | of Rama |
| दरस | दर्शन | the sight; seeing |
| की | की | for |
| लालसा | तीव्र इच्छा | longing |
| भरत | भरत के | Bharata |
| सरिस | समान | like; equal to |
| सब | सभी | all |
| साथ | साथ चलने वाले लोग | those accompanying him |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 224
- स्रोत अभिलेख
- 2.224
- सहायक विषय
- भरतजी चित्रकूटके मार्गमें
- मुद्रित पृष्ठ
- 529, 530
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