अयोध्याकाण्ड · दोहा 160 · दोहा/सोरठा
भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।
भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।
हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।160।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.16 · पुस्तक पृ. 476, 477
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।
राम के वन जाने की बात सुनते ही भरत को पिता की मृत्यु की बात भूल गई।
English explanation
On hearing of Rama’s departure for the forest, Bharata forgot his father’s death.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरतहि | भरत को | to Bharata |
| बिसरेउ | भूल गया | was forgotten |
| पितु | पिता की | his father’s |
| मरन | मृत्यु | death |
| सुनत | सुनते ही | upon hearing |
| राम | राम का | Rama’s |
| बन | वन को | for the forest |
| गौनु | गमन | departure |
2 हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।160।।
मन में स्वयं को इसका कारण जानकर भरत स्तब्ध होकर मौन रहे।
English explanation
Recognizing himself in his heart as the cause, Bharata remained stunned and silent.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हेतु | कारण | the cause |
| अपनपउ | स्वयं को | himself |
| जानि | जानकर | recognizing |
| जियँ | हृदय में | in his heart |
| थकित | स्तब्ध; अवाक् | stunned; dumbfounded |
| रहे | रहे | remained |
| धरि | धारण करके | keeping |
| मौनु | मौन | silence |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 160
- स्रोत अभिलेख
- 2.16
- सहायक विषय
- श्रीभरत-शत्रुघ्नका आगमन और शोक
- मुद्रित पृष्ठ
- 476, 477
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