अयोध्याकाण्ड · दोहा 255 · दोहा/सोरठा
बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।
बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।
सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.255 · पुस्तक पृ. 556, 557
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।
अब मुझसे उपाय पूछा जा रहा है—यह सब मेरा दुर्भाग्य है।
English explanation
That I am now being asked for a solution is entirely my misfortune.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बूझिअ | पूछा जा रहा है | is being asked |
| मोहि | मुझसे | of me |
| उपाउ | उपाय | a solution |
| अब | अब | now |
| सो | यह बात | that circumstance |
| सब | सब | entirely |
| मोर | मेरा | my |
| अभागु | दुर्भाग्य | misfortune |
2 सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।।
भरत के स्नेहपूर्ण वचन सुनकर गुरु के हृदय में प्रेम उमड़ पड़ा।
English explanation
Hearing Bharata’s affectionate words, love welled up in the guru’s heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| सनेहमय | स्नेह से भरे | filled with affection |
| बचन | वचन | words |
| गुर | गुरु वसिष्ठ के | of the guru Vashishtha |
| उर | हृदय में | in the heart |
| उमगा | उमड़ पड़ा | welled up |
| अनुरागु | प्रेम | love |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 255
- स्रोत अभिलेख
- 2.255
- सहायक विषय
- श्रीवसिष्ठजीका भाषण
- मुद्रित पृष्ठ
- 556, 557
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।