अयोध्याकाण्ड · दोहा 256 · दोहा/सोरठा
अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।
अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।
जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.256 · पुस्तक पृ. 557, 558
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।
राम और सीता अंतर्यामी हैं; आप सर्वज्ञ और सुजान हैं।
English explanation
Rama and Sita know the inner heart; you are all-knowing and discerning.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अँतरजामी | अंतर की बात जानने वाले | knowers of the inner heart |
| रामु | राम | Rama |
| सिय | सीता | Sita |
| तुम्ह | आप, मुनि वसिष्ठ | you, sage Vasishtha |
| सरबग्य | सब कुछ जानने वाले | all-knowing |
| सुजान | सुजान, विवेकशील | wise; discerning |
2 जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।।
हे नाथ, यदि आप इसे सत्य कहते हैं, तो अपने वचन को चरितार्थ कीजिए।
English explanation
My lord, if you declare this true, then make your own words good.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जो | यदि | if |
| फुर | सत्य | true |
| कहहु | आप कहते हैं | you say |
| त | तो | then |
| नाथ | हे नाथ, पूज्य स्वामी | my lord; revered master |
| निज | अपने | your own |
| कीजिअ | कीजिए | please make |
| बचनु | वचन | words; statement |
| प्रवान | सत्य सिद्ध, चरितार्थ | true in practice; fulfilled |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 256
- स्रोत अभिलेख
- 2.256
- सहायक विषय
- श्रीवसिष्ठजीका भाषण
- मुद्रित पृष्ठ
- 557, 558
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।