अयोध्याकाण्ड · दोहा 257 · दोहा/सोरठा
सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।
सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.257 · पुस्तक पृ. 558, 558
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।
आप सबके हृदय के भीतर बसते हैं और उनके अच्छे तथा बुरे भाव जानते हैं।
English explanation
You dwell within everyone’s heart and know their good and ill intentions.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सब | सभी | everyone |
| के | के | of |
| उर | हृदय | heart |
| अंतर | के भीतर | within |
| बसहु | आप बसते हैं | you dwell |
| जानहु | आप जानते हैं | you know |
| भाउ | अच्छे भाव | good intentions |
| कुभाउ | बुरे भाव | ill intentions |
2 पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।।
नगरवासियों, माताओं और भरत का जिससे हित हो, कृपया वह उपाय बताइए।
English explanation
Please tell us the course that would benefit the townspeople, the mothers, and Bharata.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुरजन | नगरवासियों का | the townspeople’s |
| जननी | माताओं का | the mothers’ |
| भरत | भरत का | Bharata’s |
| हित | कल्याण | welfare |
| होइ | हो | may be achieved |
| सो | वह | that |
| कहिअ | कृपया बताइए | please tell |
| उपाउ | उपाय | course of action |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 257
- स्रोत अभिलेख
- 2.257
- सहायक विषय
- श्रीवसिष्ठजीका भाषण
- मुद्रित पृष्ठ
- 558, 558
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।