अयोध्याकाण्ड · दोहा 88 · दोहा/सोरठा
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।
ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.88 · पुस्तक पृ. 416, 416
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।
“चौदह वर्ष वन में रहना है और मुनियों के समान व्रत, वेश तथा आहार अपनाना है।”
English explanation
“For fourteen years I must live in the forest, observing the vows, dress, and diet of sages.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरष | वर्ष | years |
| चारिदस | चौदह | fourteen |
| बासु | निवास | residence |
| बन | वन में | in the forest |
| मुनि | मुनियों के समान | of sages |
| ब्रत | व्रत; संयम के नियम | vows; ascetic observances |
| बेषु | वेश; पहनावा | dress |
| अहारु | आहार | diet |
2 ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।
“इसलिए ग्राम में निवास उचित नहीं है।” यह सुनकर गुह को भारी दुख हुआ।
English explanation
“Therefore, staying in a village is not appropriate.” Hearing this, Guha felt deep sorrow.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ग्राम | गाँव में | in a village |
| बासु | निवास | staying |
| नहिं | नहीं | not |
| उचित | उचित | appropriate |
| सुनि | सुनकर | on hearing |
| गुहहि | गुह को | to Guha |
| भयउ | हुआ | arose |
| दुखु | दुख | sorrow |
| भारु | भारी; गहरा | heavy; deep |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 88
- स्रोत अभिलेख
- 2.88
- सहायक विषय
- श्रीरामका शृङ्गवेरपुर पहुँचना, निषादके द्वारा सेवा
- मुद्रित पृष्ठ
- 416, 416
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