अयोध्याकाण्ड · दोहा 240 · दोहा/सोरठा
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।240।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.24 · पुस्तक पृ. 543, 544
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
कृपा के भंडार राम ने भरत को बलपूर्वक उठा लिया और छाती से लगा लिया।
English explanation
Rama, the treasury of compassion, firmly lifted Bharata up and clasped him to his chest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरबस | बलपूर्वक | forcibly |
| लिए | ले लिया | took him |
| उठाइ | उठाकर | lifting him up |
| उर | छाती से | to his chest |
| लाए | लगा लिया | clasped |
| कृपानिधान | कृपा के भंडार राम | Rama, treasury of compassion |
2 भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।240।।
भरत और राम का मिलन देखकर सब अपनी सुध भूल गए।
English explanation
Seeing Bharata and Rama’s reunion, everyone forgot themselves.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत | Bharata |
| राम | राम | Rama |
| की | का | of |
| मिलनि | मिलन | reunion |
| लखि | देखकर | seeing |
| बिसरे | भूल गए | forgot |
| सबहि | सभी | everyone |
| अपान | अपने आप को, अपनी सुध | themselves; self-awareness |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 240
- स्रोत अभिलेख
- 2.24
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 543, 544
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