अयोध्याकाण्ड · दोहा 241 · दोहा/सोरठा
मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।
मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।
भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम।।241।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.241 · पुस्तक पृ. 544, 545
भावार्थ और शब्दार्थ
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1मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।
शत्रुघ्न से प्रेमपूर्वक मिलकर निषादराज गुह श्रीराम से मिले।
English explanation
After lovingly meeting Shatrughna, Guha, the Nishada chief, met Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मिलि | मिलकर | having met |
| सपेम | प्रेम सहित | with love |
| रिपुसूदनहि | शत्रुघ्न से | with Shatrughna |
| केवटु | निषादराज गुह | Guha, the Nishada chief |
| भेंटेउ | मिले; भेंट की | met; embraced |
| राम | श्रीराम से | with Rama |
2 भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम।।241।।
भरत ने प्रणाम करते हुए लक्ष्मण को अत्यंत प्रेम से गले लगाया।
English explanation
Bharata embraced Lakshmana, who was bowing in salutation, with great affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भूरि | बहुत; अत्यधिक | great; abundant |
| भायँ | प्रेमभाव से | with affection |
| भेंटे | गले मिले; आलिंगन किया | embraced |
| भरत | भरत | Bharata, Rama’s brother |
| लछिमन | लक्ष्मण को | Lakshmana, Rama’s younger brother |
| करत | करते हुए | making; offering |
| प्रनाम | प्रणाम | a respectful bow |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 241
- स्रोत अभिलेख
- 2.241
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 544, 545
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