अयोध्याकाण्ड · दोहा 239 · दोहा/सोरठा
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।
ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु।।239।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.239 · पुस्तक पृ. 542, 543
भावार्थ और शब्दार्थ
1लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।
मुनियों की मंडली के बीच सीता और रघुवंश के चंद्रमा राम सुंदर शोभा पा रहे थे।
English explanation
Amid the circle of sages, Sita and Rama, the moon of the Raghu line, shone beautifully.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लसत | शोभित हो रहे हैं | shine |
| मंजु | सुंदर ढंग से | beautifully |
| मुनि | मुनियों की | of sages |
| मंडली | मंडली | circle; gathering |
| मध्य | बीच में | amid |
| सीय | सीता | Sita |
| रघुचंदु | रघुवंश के चंद्रमा राम | Rama, the moon of the Raghu line |
2 ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु।।239।।
मानो ज्ञान की सभा में भक्ति और सच्चिदानंद ने शरीर धारण कर लिया हो—सीता भक्ति के रूप में और राम सच्चिदानंद के रूप में।
English explanation
It was as though devotion and Being-Consciousness-Bliss had taken bodily form in an assembly of wisdom—Sita as devotion and Rama as Being-Consciousness-Bliss.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ग्यान | ज्ञान की | of wisdom |
| सभाँ | सभा में | in the assembly |
| जनु | मानो | as though |
| तनु | शरीर | bodily form |
| धरे | धारण किए हों | had assumed |
| भगति | भक्ति | devotion |
| सच्चिदानंदु | सत्, चित् और आनंद स्वरूप | Being-Consciousness-Bliss |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 239
- स्रोत अभिलेख
- 2.239
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 542, 543
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।