अयोध्याकाण्ड · दोहा 238 · दोहा/सोरठा
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।238।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.238 · पुस्तक पृ. 541, 542
भावार्थ और शब्दार्थ
1पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।
प्रेम अमृत है, विरह मंदर पर्वत है और भरत गहरा समुद्र हैं।
English explanation
Love is the nectar, separation the Mandara mountain, and Bharata the deep ocean.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पेम | प्रेम | love |
| अमिअ | अमृत | nectar of immortality |
| मंदरु | मंदर पर्वत, मंथन का आधार | Mount Mandara, the churning rod |
| बिरहु | विरह, राम से बिछोह | separation from Rama |
| भरतु | भरत | Bharata |
| पयोधि | समुद्र | ocean |
| गँभीर | गहरा | deep |
2 मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।238।।
कृपा के समुद्र रघुवीर ने उस समुद्र को मथकर देवताओं और साधुओं के हित के लिए प्रेम-अमृत प्रकट किया।
English explanation
Rama, the ocean of compassion, churned that ocean and brought forth the nectar of love for the benefit of gods and holy people.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मथि | मथकर | having churned |
| प्रगटेउ | प्रकट किया | brought forth |
| सुर | देवताओं के | of the gods |
| साधु | संतों के | of holy people |
| हित | हित के लिए | for the benefit |
| कृपासिंधु | कृपा के समुद्र | the ocean of compassion |
| रघुबीर | रघुकुल के वीर राम | Rama, hero of Raghu's lineage |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 238
- स्रोत अभिलेख
- 2.238
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 541, 542
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।