अयोध्याकाण्ड · दोहा 23 · दोहा/सोरठा
प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार।
प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार।
एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.23 · पुस्तक पृ. 362, 363
भावार्थ और शब्दार्थ
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1प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार।
नगर के पुरुष और स्त्रियाँ अत्यंत प्रसन्न थे; सभी शुभ मंगलाचार की तैयारियाँ कर रहे थे।
English explanation
The men and women of the city were delighted; all were preparing auspicious observances.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रमुदित | अत्यंत प्रसन्न | delighted |
| पुर | नगर के | of the city |
| नर | पुरुष | men |
| नारि | स्त्रियाँ | women |
| सब | सभी | all |
| सजहिं | तैयार करते हैं | prepare |
| सुमंगलचार | शुभ मांगलिक रीति-कार्य | auspicious ceremonial observances |
2 एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।।
कुछ लोग भीतर प्रवेश कर रहे थे, कुछ बाहर निकल रहे थे; राजा के दरबार में भीड़ थी।
English explanation
Some were entering and others leaving; the king’s court was crowded.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एक | कुछ लोग | some people |
| प्रबिसहिं | प्रवेश करते हैं | enter |
| एक | कुछ अन्य लोग | others |
| निर्गमहिं | बाहर निकलते हैं | leave |
| भीर | भीड़ | a crowd |
| भूप | राजा दशरथ के | of King Dasharatha |
| दरबार | दरबार में | in the court |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 23
- स्रोत अभिलेख
- 2.23
- सहायक विषय
- कैकेयीका कोपभवनमें जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 362, 363
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