अयोध्याकाण्ड · दोहा 158 · दोहा/सोरठा
पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।
पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।
भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं।।158।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.158 · पुस्तक पृ. 474, 475
भावार्थ और शब्दार्थ
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1पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।
नगरवासी मिलते थे, पर कुछ कहते नहीं थे; चुपचाप प्रणाम करके चले जाते थे।
English explanation
The townspeople met him but said nothing; they quietly paid their respects and went away.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुरजन | नगरवासी | townspeople |
| मिलिहिं | मिलते हैं | meet him |
| न | नहीं | not |
| कहहिं | कहते हैं | say |
| कछु | कुछ भी | anything |
| गवँहिं | चुपचाप | quietly |
| जोहारहिं | प्रणाम करते हैं | pay their respects |
| जाहिं | चले जाते हैं | go away |
2 भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं।।158।।
मन में भय और विषाद होने के कारण भरत कुशल-क्षेम पूछ नहीं पाते थे।
English explanation
With fear and sorrow in his heart, Bharata could not ask about everyone’s well-being.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत, राम के भाई | Bharata, Rama’s brother |
| कुसल | कुशल-क्षेम | well-being |
| पूँछि | पूछ | ask about |
| न | नहीं | not |
| सकहिं | सकते हैं | is able to |
| भय | भय | fear |
| बिषाद | विषाद | sorrow |
| मन | मन | the heart |
| माहिं | में | in |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 158
- स्रोत अभिलेख
- 2.158
- सहायक विषय
- श्रीभरत-शत्रुघ्नका आगमन और शोक
- मुद्रित पृष्ठ
- 474, 475
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।