अयोध्याकाण्ड · दोहा 157 · दोहा/सोरठा
एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।
एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।
गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।157।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.157 · पुस्तक पृ. 473, 474
भावार्थ और शब्दार्थ
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1एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।
जब भरत इस प्रकार मन में चिंता कर रहे थे, तभी धावक दूत आ पहुँचे।
English explanation
While Bharata was worrying in his heart in this way, the courier messengers arrived.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एहि | इस | this |
| बिधि | प्रकार | way |
| सोचत | चिंता करते हुए | while worrying |
| भरत | भरत | Bharata |
| मन | मन में | in his heart |
| धावन | धावक दूत | courier messengers |
| पहुँचे | पहुँचे | arrived |
| आइ | आकर | having come |
2 गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।157।।
गुरु की आज्ञा कानों से सुनकर, गणेश को मनाकर वे चल पड़े।
English explanation
Having heard the guru’s command, they set out after invoking Ganesha.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गुर | गुरु वसिष्ठ की | of Guru Vasishtha |
| अनुसासन | आज्ञा | command |
| श्रवन | कानों से | with their ears |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| चले | चल पड़े | set out |
| गनेसु | भगवान गणेश को | Lord Ganesha |
| मनाइ | मनाकर; प्रार्थना करके | having invoked; having prayed to |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 157
- स्रोत अभिलेख
- 2.157
- सहायक विषय
- मुनि वसिष्ठका भरतजीको बुलानेके लिये दूत भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 473, 474
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