अयोध्याकाण्ड · दोहा 288 · दोहा/सोरठा
निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।
निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।
कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.288 · पुस्तक पृ. 584, 585
भावार्थ और शब्दार्थ
1निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।
भरत असीम गुणों वाले अनुपम पुरुष हैं; भरत को केवल भरत के ही समान जानो।
English explanation
Bharata is an incomparable man of boundless virtues; know Bharata to be like Bharata alone.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निरवधि | असीम | boundless |
| गुन | गुण | virtues |
| निरुपम | अनुपम | incomparable |
| पुरुषु | पुरुष | man |
| भरतु | भरत | Bharata, Rama’s brother |
| भरत | भरत के ही | Bharata alone |
| सम | समान | like |
| जानि | जानो; समझो | know; regard |
2 कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।
क्या सुमेरु पर्वत को एक सेर के बराबर कहा जा सकता है? कवियों की बुद्धि ऐसा कहने में संकोच करती है।
English explanation
Can Mount Sumeru be called equal to a mere seer in weight? The poets’ intellect shrinks from saying so.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहिअ | कहा जाए | should be called |
| सुमेरु | सुमेरु पर्वत | Mount Sumeru, the cosmic mountain |
| कि | क्या | can; whether |
| सेर | एक सेर वजन | a seer of weight |
| सम | बराबर | equal to |
| कबिकुल | कवियों के समुदाय की | of the community of poets |
| मति | बुद्धि | intellect |
| सकुचानि | संकोच करती है | hesitates; shrinks back |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 288
- स्रोत अभिलेख
- 2.288
- सहायक विषय
- जनक-सुनयना-संवाद, भरतजीकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 584, 585
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।