अयोध्याकाण्ड · दोहा 227 · दोहा/सोरठा
नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।।
नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।।
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान।।227।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.227 · पुस्तक पृ. 532, 533
भावार्थ और शब्दार्थ
1नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।।
हे नाथ, आप सुहृदय, अत्यंत सरलचित्त और शील तथा स्नेह के भंडार हैं।
English explanation
My lord, you are kindhearted, utterly straightforward in heart, and a treasure of good character and affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे स्वामी | O lord |
| सुह्रद | सुहृदय; हितैषी | kindhearted; well-disposed |
| सुठि | बहुत; अत्यंत | very; utterly |
| सरल | सरल; निष्कपट | straightforward; guileless |
| चित | चित्त वाले | in heart |
| सील | शील; सदाचरण | good character |
| सनेह | स्नेह | affection |
| निधान | भंडार | treasure; repository |
2 सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान।।227।।
आपके हृदय में सबके प्रति प्रेम और विश्वास है; आप सबको अपने समान समझते हैं।
English explanation
Your heart holds love and trust toward everyone; you regard everyone as being like yourself.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सब | सबके | everyone |
| पर | प्रति | toward |
| प्रीति | प्रेम | love |
| प्रतीति | विश्वास | trust |
| जियँ | हृदय में | in your heart |
| जानिअ | आप समझते हैं | you regard |
| आपु | अपने | yourself |
| समान | समान | like; equal to |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 227
- स्रोत अभिलेख
- 2.227
- सहायक विषय
- श्रीसीताजीका स्वप्न, श्रीरामजीको कोल-किरातोंद्वारा भरतजीके आगमनकी सूचना, रामजीका शोक, लक्ष्मणजीका क्रोध
- मुद्रित पृष्ठ
- 532, 533
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।