अयोध्याकाण्ड · दोहा 37 · दोहा/सोरठा
द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।
द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।
जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.37 · पुस्तक पृ. 374, 375
भावार्थ और शब्दार्थ
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1द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।
द्वार पर भीड़ है; सेवक और मंत्री सूर्य को उदित देखकर कहते हैं—
English explanation
A crowd gathers at the doorway; seeing the sun risen, servants and ministers say—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| द्वार | द्वार पर | at the doorway |
| भीर | भीड़ | a crowd |
| सेवक | सेवक | servants |
| सचिव | मंत्री | ministers |
| कहहिं | कहते हैं | say |
| उदित | उदित हुए | risen |
| रबि | सूर्य को | the sun |
| देखि | देखकर | on seeing |
2 जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।
‘अयोध्या के राजा अभी तक नहीं जागे; इसका विशेष कारण क्या है?’
English explanation
“The king of Ayodhya has still not awakened; what particular reason could there be?”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जागेउ | जागे | has awakened |
| अजहुँ | अभी तक | still; as yet |
| न | नहीं | not |
| अवधपति | अयोध्या के राजा दशरथ | Dasharatha, king of Ayodhya |
| कारनु | कारण | reason |
| कवनु | कौन-सा | what |
| बिसेषि | विशेष | particular |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 37
- स्रोत अभिलेख
- 2.37
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 374, 375
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