अयोध्याकाण्ड · दोहा 317 · दोहा/सोरठा
तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।
तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।
भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार।।317।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.317 · पुस्तक पृ. 609, 609
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।
एआई प्रारूप: वे भी राम और भरत का अनुपम, अपार प्रेम देखकर—
English explanation
AI draft: Even they, seeing the matchless, boundless love between Rama and Bharata—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेउ | वे भी | even they |
| बिलोकि | देखकर | seeing |
| रघुबर | रघुवंश में श्रेष्ठ राम | Rama, foremost of Raghu’s lineage |
| भरत | भरत | Bharata, Rama’s brother |
| प्रीति | परस्पर प्रेम | mutual love |
| अनूप | अनुपम | matchless |
| अपार | असीम | boundless |
2 भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार।।317।।
एआई प्रारूप: मन, तन और वचन सहित, अपने वैराग्य और विवेक के साथ भी, उस प्रेम में मग्न हो गए।
English explanation
AI draft: They became absorbed in that love with mind, body, and speech, together with their detachment and discernment.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भए | हो गए | became |
| मगन | प्रेम में डूबे | absorbed in love |
| मन | मन | mind |
| तन | शरीर | body |
| बचन | वाणी | speech |
| सहित | साथ; सहित | together with |
| बिराग | वैराग्य; अनासक्ति | detachment |
| बिचार | विवेक; विचार | discernment; reflection |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 317
- स्रोत अभिलेख
- 2.317
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 609, 609
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।