अयोध्याकाण्ड · दोहा 318 · दोहा/सोरठा
लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।
लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।318।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.318 · पुस्तक पृ. 610, 610
भावार्थ और शब्दार्थ
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1लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।
लक्ष्मण को गले लगाकर और प्रणाम करके, तथा सीता के चरणों की धूल सिर पर रखकर—
English explanation
After embracing Lakshmana and bowing to him, and placing the dust of Sita’s feet upon their heads—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लखनहि | लक्ष्मण को | Lakshmana |
| भेंटि | गले लगाकर | having embraced |
| प्रनामु | प्रणाम | a respectful bow |
| करि | करके | having made |
| सिर | सिर पर | upon their heads |
| धरि | रखकर | having placed |
| सिय | सीता के | Sita’s |
| पद | चरणों की | of the feet |
| धूरि | धूल | dust |
2 चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।318।।
वे प्रेमपूर्वक दिए गए आशीर्वाद सुनकर चले, जो समस्त शुभ मंगलों की जड़ थे।
English explanation
They departed after hearing lovingly given blessings, the source of every auspicious good.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चले | चल पड़े | departed |
| सप्रेम | प्रेमपूर्वक दिए गए | lovingly given |
| असीस | आशीर्वाद | blessings |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| सकल | सभी | all |
| सुमंगल | शुभ मंगलों की | auspicious goods |
| मूरि | जड़; मूल स्रोत | root; source |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 318
- स्रोत अभिलेख
- 2.318
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 610, 610
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