अयोध्याकाण्ड · दोहा 17 · दोहा/सोरठा
तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।
तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।
मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.17 · पुस्तक पृ. 357, 358
भावार्थ और शब्दार्थ
1तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।
आपको कोई चिंता नहीं; अपने सुहाग के बल पर आप राजा को अपने वश में समझती हैं।
English explanation
You have no concern; relying on your favored position as his wife, you consider the king under your control.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्हहि | आपको | to you |
| न | नहीं | not |
| सोचु | चिंता | concern |
| सोहाग | पति के प्रेम और सुहाग का | of marital favor and love |
| बल | बल पर | on the strength |
| निज | अपने | your own |
| बस | वश में | under control |
| जानहु | समझती हैं | consider |
| राउ | राजा दशरथ को | King Dasharatha |
2 मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।
मंथरा कहती है: राजा के मन में कपट है, पर मुख से मीठे बोल हैं; आपका स्वभाव सरल है।
English explanation
Manthara claims: The king is deceitful at heart but sweet in speech; your nature is trusting and straightforward.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मन | मन | heart |
| मलीन | कपटपूर्ण | tainted by deceit |
| मुह | मुख या वचन | mouth or speech |
| मीठ | मीठे | sweet |
| नृप | राजा दशरथ | King Dasharatha |
| राउर | आपका | your |
| सरल | सरल, निष्कपट | straightforward and trusting |
| सुभाउ | स्वभाव | nature |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 17
- स्रोत अभिलेख
- 2.17
- सहायक विषय
- सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 357, 358
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।