अयोध्याकाण्ड · दोहा 125 · दोहा/सोरठा
तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ।।125।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.125 · पुस्तक पृ. 447, 448
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
पिता के वचन का पालन, फिर माता का हित, और भरत जैसे भाई का राजा होना—
English explanation
Fulfilling my father's word, serving my mother's interests, and having a brother like Bharata as king—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तात | पिता के | my father's |
| बचन | वचन का पालन | fulfilling the word |
| पुनि | फिर, और | further, and |
| मातु | माता का | my mother's |
| हित | हित | interests, welfare |
| भाइ | भाई | brother |
| भरत | भरत | Bharata, Rama's brother |
| अस | जैसा | such as |
| राउ | राजा | king |
2 मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ।।125।।
और हे प्रभु, मुझे आपके दर्शन मिलना—यह सब मेरे पुण्य का फल है।
English explanation
And, revered sir, my being able to see you—all this is the fruit of my merit.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मो | मुझ | me |
| कहुँ | को | to |
| दरस | दर्शन | the sight of you |
| तुम्हार | आपके | your |
| प्रभु | हे प्रभु, हे आदरणीय मुनि | O revered master |
| सबु | यह सब | all this |
| मम | मेरे | my |
| पुन्य | पुण्य | merit from good deeds |
| प्रभाउ | प्रभाव, फल | effect, fruit |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 125
- स्रोत अभिलेख
- 2.125
- सहायक विषय
- श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 447, 448
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।