अयोध्याकाण्ड · सोरठा 126 · सोरठा
राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।
राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह॥ १२६॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.126 · पुस्तक पृ. 448, 448
भावार्थ और शब्दार्थ
1राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।
हे राम, आपका स्वरूप वाणी की पहुँच से बाहर और बुद्धि से परे है।
English explanation
Rama, your essential nature is beyond the reach of speech and beyond the intellect.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | हे राम | O Rama |
| सरूप | स्वरूप | essential nature |
| तुम्हार | आपका | your |
| बचन | वाणी के लिए | to speech |
| अगोचर | पहुँच से बाहर | inaccessible |
| बुद्धिपर | बुद्धि से परे | beyond the intellect |
2अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह॥ १२६॥
आपका स्वरूप समझ में न आने वाला, कथन से परे और असीम है; वेद सदा ‘यह नहीं, यह नहीं’ कहकर उसका निरूपण करते हैं।
English explanation
Your nature is unknowable, indescribable, and boundless; the Vedas continually describe it by saying, ‘not this, not this.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अबिगत | जानने की पहुँच से बाहर | beyond knowing |
| अकथ | कहा न जा सकने वाला | indescribable |
| अपार | असीम | boundless |
| नेति | यह नहीं | not this |
| नेति | यह नहीं | not this |
| नित | सदा | continually |
| निगम | वेद | the Vedas |
| कह | कहते हैं | say |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- सोरठा 126
- स्रोत अभिलेख
- 2.126
- सहायक विषय
- श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 448, 448
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।