अयोध्याकाण्ड · दोहा 131 · दोहा/सोरठा
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.131 · पुस्तक पृ. 452, 453
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
जिसे कभी कुछ नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है—
English explanation
One who never desires anything and has a natural love for you—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जाहि | जिसे | who |
| न | नहीं | not |
| चाहिअ | चाहिए | desires |
| कबहुँ | कभी | ever |
| कछु | कुछ भी | anything |
| तुम्ह | आप | you |
| सन | से | for |
| सहज | स्वाभाविक और निष्कपट | natural and unfeigned |
| सनेहु | प्रेम | love |
2 बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।।
उसके मन में निरंतर निवास कीजिए; वही आपका अपना घर है।
English explanation
Dwell continually in that person's heart; it is your own home.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बसहु | निवास कीजिए | please dwell |
| निरंतर | सदा | continually |
| तासु | उसके | that person's |
| मन | मन में | in the heart |
| सो | वह | that |
| राउर | आपका | your |
| निज | अपना | own |
| गेहु | घर | home |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 131
- स्रोत अभिलेख
- 2.131
- सहायक विषय
- श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 452, 453
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।