अयोध्याकाण्ड · दोहा 267 · दोहा/सोरठा
जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।
जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.267 · पुस्तक पृ. 566, 566
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।
उस वृक्ष को पहचानकर उसके निकट जाने पर उसकी छाया सब चिंताओं को शांत करती है।
English explanation
Recognizing that tree and going near it, one finds its shade dispels every care.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जाइ | जाकर | going |
| निकट | पास | near |
| पहिचानि | पहचानकर | having recognized |
| तरु | वृक्ष की | of the tree |
| छाहँ | छाया | shade |
| समनि | शांत करने वाली | dispelling |
| सब | सभी | all |
| सोच | चिंताएँ | cares |
2 मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।।
जगत में राजा हो या निर्धन, भला हो या बुरा—उससे माँगने पर अपना मनचाहा फल पाता है।
English explanation
In this world, king or pauper, good or bad, whoever asks of it receives what they desire.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मागत | माँगने पर | upon asking |
| अभिमत | मनचाहा फल | the desired result |
| पाव | पाता है | receives |
| जग | जगत में | in the world |
| राउ | राजा | king |
| रंकु | निर्धन | pauper |
| भल | भला व्यक्ति | a good person |
| पोच | बुरा व्यक्ति | a bad person |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 267
- स्रोत अभिलेख
- 2.267
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 566, 566
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