अयोध्याकाण्ड · दोहा 134 · दोहा/सोरठा
जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।
जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।
करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।134।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.134 · पुस्तक पृ. 455, 456
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।
प्रभु राम ने यथायोग्य सम्मान देकर मुनियों के समूह को विदा किया।
English explanation
Lord Rama duly honored the company of sages and bade them farewell.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जथाजोग | यथायोग्य | as befitted them |
| सनमानि | सम्मान करके | having honored |
| प्रभु | प्रभु राम ने | Lord Rama |
| बिदा | विदा | farewell |
| किए | किया | gave |
| मुनिबृंद | मुनियों के समूह को | to the company of sages |
2 करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।134।।
मुनि अपने आश्रमों में निश्चिंत होकर योग, जप, यज्ञ और तप करते हैं।
English explanation
The sages freely practice yoga, recitation, sacrificial rites, and austerities in their own hermitages.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करहि | करते हैं | practice |
| जोग | योग | yoga |
| जप | मंत्र-जप | mantra recitation |
| जाग | यज्ञ | sacrificial rites |
| तप | तपस्या | austerities |
| निज | अपने | their own |
| आश्रमन्हि | आश्रमों में | in hermitages |
| सुछंद | निश्चिंत और स्वतंत्र होकर | freely and without care |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 134
- स्रोत अभिलेख
- 2.134
- सहायक विषय
- चित्रकूटमें निवास, कोल-भीलोंके द्वारा सेवा
- मुद्रित पृष्ठ
- 455, 456
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