अयोध्याकाण्ड · दोहा 47 · दोहा/सोरठा
काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।
काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.47 · पुस्तक पृ. 382, 383
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।
आग क्या नहीं जला सकती, और समुद्र में क्या नहीं समा सकता?
English explanation
What can fire not burn, and what cannot be contained in the ocean?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| काह | किसे; क्या | what |
| न | नहीं | not |
| पावकु | आग | fire |
| जारि | जला | burn |
| सक | सकती | can |
| का | क्या | what |
| न | नहीं | not |
| समुद्र | समुद्र में | in the ocean |
| समाइ | समा सकता | can be contained |
2 का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।
प्रबल हो उठी ‘अबला’ क्या नहीं कर सकती, और जगत में काल किसे नहीं खाता?
English explanation
What can a supposedly weak woman not do when powerful, and whom in the world does Time not devour?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| का | क्या | what |
| न | नहीं | not |
| करै | कर सकती है | can do |
| अबला | स्त्री; कथित निर्बला | woman, conventionally called weak |
| प्रबल | शक्तिशाली होकर | when powerful |
| केहि | किसे | whom |
| जग | जगत में | in the world |
| कालु | काल; मृत्यु | Time; death |
| न | नहीं | not |
| खाइ | खा जाता; निगलता | devours |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 47
- स्रोत अभिलेख
- 2.47
- सहायक विषय
- श्रीराम-दशरथ-संवाद, अवध-वासियोंका विषाद, कैकेयीको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 382, 383
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।