अयोध्याकाण्ड · दोहा 48 · दोहा/सोरठा
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.48 · पुस्तक पृ. 383, 384
भावार्थ और शब्दार्थ
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1चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।
भले ही चंद्रमा आग के कण बरसाने लगे और अमृत विष के समान हो जाए—
English explanation
Even if the moon were to shower particles of fire and nectar become like poison—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चंदु | चंद्रमा | the moon |
| चवै | बरसाए | were to shower |
| बरु | भले ही | even if |
| अनल | आग के | of fire |
| कन | कण | particles |
| सुधा | अमृत | nectar of immortality |
| होइ | हो जाए | were to become |
| बिषतूल | विष के समान | like poison |
2 सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।
तब भी भरत कभी स्वप्न में भी राम के विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे।
English explanation
Even then, Bharata would never do anything against Rama, not even in a dream.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सपनेहुँ | स्वप्न में भी | even in a dream |
| कबहुँ | कभी | ever |
| न | नहीं | not |
| करहिं | करेंगे | would do |
| किछु | कुछ भी | anything |
| भरतु | भरत | Bharata |
| राम | राम के | to Rama |
| प्रतिकूल | विरुद्ध | contrary |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 48
- स्रोत अभिलेख
- 2.48
- सहायक विषय
- श्रीराम-दशरथ-संवाद, अवध-वासियोंका विषाद, कैकेयीको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 383, 384
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।