अयोध्याकाण्ड · दोहा 60 · दोहा/सोरठा
कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।
कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।
लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।60।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.6 · पुस्तक पृ. 393, 394
भावार्थ और शब्दार्थ
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1कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।
राम ने विवेकपूर्ण प्रिय वचन कहकर माता को संतुष्ट किया।
English explanation
By speaking kind words full of discernment, Rama reassured his mother.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहि | कहकर | by speaking |
| प्रिय | प्रिय; मनभावन | kind; pleasing |
| बचन | वचन; बातें | words |
| बिबेकमय | विवेक से भरे | full of discernment |
| कीन्हि | किया; कर दिया | brought about |
| मातु | माता को | for his mother |
| परितोष | संतोष; तसल्ली | satisfaction; reassurance |
2 लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।60।।
फिर राम वन के गुण और दोष स्पष्ट करके जानकी को समझाने लगे।
English explanation
Then Rama began to counsel Janaki, explaining the advantages and hardships of the forest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लगे | लगे; आरंभ किया | began |
| प्रबोधन | समझाना; बोध कराना | to counsel; to explain |
| जानकिहि | जानकी अर्थात सीता को | to Janaki, Sita |
| प्रगटि | प्रकट करके; स्पष्ट बताकर | by making clear; explaining |
| बिपिन | वन के | of the forest |
| गुन | गुण; लाभ | merits; advantages |
| दोष | दोष; कठिनाइयाँ | drawbacks; hardships |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 60
- स्रोत अभिलेख
- 2.6
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 393, 394
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