अयोध्याकाण्ड · दोहा 59 · दोहा/सोरठा
करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।
करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।
बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.59 · पुस्तक पृ. 392, 393
भावार्थ और शब्दार्थ
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1करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।
वन में हाथी, सिंह, राक्षस और अनेक दुष्ट जीव विचरते हैं।
English explanation
Elephants, lions, demons, and many dangerous creatures roam the forest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करि | हाथी | elephants |
| केहरि | सिंह | lions |
| निसिचर | राक्षस; रात में विचरने वाले | demons; night-roamers |
| चरहिं | विचरते हैं | roam |
| दुष्ट | दुष्ट; हानिकारक | wicked; dangerous |
| जंतु | जीव | creatures |
| बन | वन में | in the forest |
| भूरि | बहुत-से | many |
2 बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।।
हे पुत्र, क्या विष की वाटिका में सुंदर संजीवनी जड़ी शोभा देती है?
English explanation
My son, would a lovely life-restoring herb belong in a garden of poison?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिष | विष की | of poison |
| बाटिकाँ | वाटिका में | in a garden |
| कि | क्या | would; does |
| सोह | शोभा देती है; उपयुक्त लगती है | befit; look fitting |
| सुत | हे पुत्र | O son |
| सुभग | सुंदर; मनोहर | beautiful; lovely |
| सजीवनि | जीवन पुनः देने वाली संजीवनी | life-restoring |
| मूरि | जड़ी; मूल | herb; root |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 59
- स्रोत अभिलेख
- 2.59
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 392, 393
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