अयोध्याकाण्ड · दोहा 212 · दोहा/सोरठा
करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।
करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।
कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।212।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.212 · पुस्तक पृ. 519, 520
भावार्थ और शब्दार्थ
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1करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।
समझाकर श्रेष्ठ मुनि ने कहा, ‘प्रेमप्रिय अतिथि बनकर हमारा आतिथ्य स्वीकार करो।’
English explanation
Having consoled him, the eminent sage said, ‘Be our guest, dear to us in affection, and accept our hospitality.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करि | करके | having given |
| प्रबोध | समझाइश और सांत्वना | reassurance and consolation |
| मुनिबर | श्रेष्ठ मुनि भरद्वाज | the eminent sage Bharadvaja |
| कहेउ | कहा | said |
| अतिथि | अतिथि | a guest |
| पेमप्रिय | प्रेम से प्रिय | dear through affection |
| होहु | बनो | be |
2 कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।212।।
हम कंद, मूल, फल और फूल देते हैं; स्नेह करके इन्हें स्वीकार करो।
English explanation
We offer tubers, roots, fruits, and flowers; kindly accept them with affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कंद | खाने योग्य कंद | edible tubers |
| मूल | जड़ें | roots |
| फल | फल | fruits |
| फूल | फूल | flowers |
| हम | हम | we |
| देहिं | देते हैं | offer |
| लेहु | स्वीकार करो | accept |
| करि | करके | showing |
| छोहु | स्नेह या कृपा | affection or kindness |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 212
- स्रोत अभिलेख
- 2.212
- सहायक विषय
- भरतजीका प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 519, 520
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