अयोध्याकाण्ड · दोहा 207 · दोहा/सोरठा
अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।
अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।
सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।207।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.207 · पुस्तक पृ. 515, 515
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।
अब, भरत, तुमने बहुत अच्छा किया; यह विचार तुम्हारे योग्य है।
English explanation
Now, Bharata, you have done very well; this resolve is fitting for you.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अब | अब | now |
| अति | बहुत; अत्यंत | very |
| कीन्हेहु | तुमने किया है | you have done |
| भरत | हे भरत, राम के भाई | Bharata, Rama’s brother, addressed here |
| भल | अच्छा | well |
| तुम्हहि | तुम्हारे लिए | for you |
| उचित | योग्य; उचित | fitting |
| मत | विचार; संकल्प | view; resolve |
| एहु | यह | this |
2 सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।207।।
जगत में समस्त शुभ मंगलों का मूल श्रीराम के चरणों में प्रेम है।
English explanation
Love for the feet of Rama is the root of all auspicious good in the world.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सकल | समस्त | all |
| सुमंगल | शुभ मंगल; कल्याण | auspicious good; blessings |
| मूल | मूल; आधार | root; foundation |
| जग | जगत में | in the world |
| रघुबर | रघुवंश के श्रेष्ठ श्रीराम के | of Rama, foremost of Raghu’s lineage |
| चरन | चरणों में | for the feet |
| सनेहु | प्रेम; स्नेह | love; affection |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 207
- स्रोत अभिलेख
- 2.207
- सहायक विषय
- भरतजीका प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 515, 515
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