अयोध्याकाण्ड · दोहा 206 · दोहा/सोरठा
तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति।
तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति।
तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।206।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.206 · पुस्तक पृ. 514, 515
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति।
अपनी माता के किए को सोचकर तुम मन में ग्लानि मत करो।
English explanation
Do not feel remorse in your heart over what your mother did.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | तुम | you |
| गलानि | ग्लानि, आत्मदुःख | remorse |
| जियँ | मन में | in your heart |
| जनि | मत | do not |
| करहु | करो | feel |
| समुझी | सोचकर, विचारकर | considering |
| मातु | माता कैकेयी की | of your mother Kaikeyi |
| करतूति | करनी, किया हुआ कार्य | deed |
2 तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।206।।
हे तात, कैकेयी का दोष नहीं है; सरस्वती गईं और उनकी बुद्धि को विचलित कर दिया।
English explanation
Dear son, Kaikeyi is not to blame; Sarasvati went and unsettled her understanding.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तात | हे प्रिय पुत्र | dear son |
| कैकइहि | कैकेयी को, कैकेयी का | to Kaikeyi; Kaikeyi’s |
| दोसु | दोष | blame |
| नहिं | नहीं है | there is none |
| गई | गईं | went |
| गिरा | वाणी की देवी सरस्वती | Sarasvati, goddess of speech |
| मति | बुद्धि को | her understanding |
| धूति | विचलित करके | having unsettled |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 206
- स्रोत अभिलेख
- 2.206
- सहायक विषय
- भरतजीका प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 514, 515
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