अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।।
मूल पाठ
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।।
राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।
स्रोत अभिलेख 2.25 · पुस्तक पृ. 551, 552
भावार्थ
मूल पाठ के बादहमलोगोंको आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमिके लिये गङ्गाजीकी धारा दुर्लभ है! [देखिये,] कृपालु श्रीरामचन्द्रजीने निषादपर कैसी कृपा की है। जैसे राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजाको भी होना चाहिये॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 552 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।।
English explanation
The sight of you is exceedingly rare for us, like a stream of the Ganges in desert land.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हमहि | हमारे लिए | for us |
| अगम | दुर्लभ, पहुँच से बाहर | hard to obtain; beyond reach |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| दरसु | दर्शन | the sight |
| तुम्हारा | आपका | of you |
| जस | जैसे | like |
| मरु | मरुस्थल की | desert |
| धरनि | भूमि में | in the land |
| देवधुनि | गंगा की | of the Ganges |
| धारा | जलधारा | stream |
2 राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।
English explanation
Compassionate Rama has favored the Nishada; his household and subjects too should show affection as their king does.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम ने | Rama |
| कृपाल | कृपालु | compassionate |
| निषाद | निषाद को | the Nishada |
| नेवाजा | अनुग्रह किया, सम्मान दिया | favored; honored |
| परिजन | परिवार और निकटवर्ती जन | household and close associates |
| प्रजउ | प्रजा भी | subjects too |
| चहिअ | प्रेम करना चाहिए | should show affection |
| जस | जैसा | as |
| राजा | राजा करता है | the king does |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.25
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 552
- सहायक विषय
- वनवासियोंद्वारा भरतजीकी मण्डलीका सत्कार, कैकेयीका पश्चात्ताप
- मुद्रित पृष्ठ
- 551, 552
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।