अयोध्याकाण्ड · दोहा 250 · दोहा/सोरठा
यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।
यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।
हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.25 · पुस्तक पृ. 551, 552
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।
यह बात मन में समझकर संकोच छोड़िए और हमारा प्रेम देखकर हम पर स्नेह कीजिए।
English explanation
Understanding this in your hearts, put aside hesitation and, seeing our love, show us affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| यह | यह बात | this |
| जिंयँ | मन में | in your heart |
| जानि | समझकर | having understood |
| सँकोचु | संकोच | hesitation |
| तजि | छोड़कर | putting aside |
| करिअ | कीजिए | please show |
| छोहु | स्नेह, अनुकंपा | affection; kindness |
| लखि | देखकर | seeing |
| नेहु | हमारा प्रेम | our love |
2 हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।।
हमें कृतार्थ करने के लिए ये फल, तृण और अंकुर स्वीकार कीजिए।
English explanation
To make us feel fulfilled, please accept these fruits, grasses, and shoots.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हमहि | हमें | us |
| कृतारथ | कृतार्थ, धन्य | fulfilled; blessed |
| करन | करने | to make |
| लगि | के लिए | in order to |
| फल | फल | fruits |
| तृन | तृण, घास | grasses; herbs |
| अंकुर | अंकुर | young shoots |
| लेहु | स्वीकार कीजिए | please accept |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 250
- स्रोत अभिलेख
- 2.25
- सहायक विषय
- वनवासियोंद्वारा भरतजीकी मण्डलीका सत्कार, कैकेयीका पश्चात्ताप
- मुद्रित पृष्ठ
- 551, 552
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।