अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।।
मूल पाठ
सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।।
नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।
स्रोत अभिलेख 2.322 · पुस्तक पृ. 613, 613
भावार्थ
मूल पाठ के बादतथा मन्त्री, गुरुजी तथा भरतजीको राज्य सौंपकर, सारा साज-सामान ठीक करके तिरहुतको चले। नगरके स्त्री-पुरुष गुरुजीकी शिक्षा मानकर श्रीरामजीकी राजधानी अयोध्याजीमें सुखपूर्वक रहने लगे॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 613 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।।
English explanation
Entrusting the kingdom to the ministers, the preceptor, and Bharata, Janaka made all preparations and departed for Tirhut.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सौंपि | सौंपकर | having entrusted |
| सचिव | मंत्रियों को | to the ministers |
| गुर | गुरु वसिष्ठ को | to the preceptor Vasishtha |
| भरतहि | भरत को | to Bharata |
| राजू | राज्य; शासन का दायित्व | the kingdom; responsibility for governance |
| तेरहुति | तिरहुत; जनक की मिथिला | Tirhut, Janaka’s Mithila |
| चले | रवाना हुए | departed |
| साजि | तैयार करके | having prepared |
| सबु | समस्त | all |
| साजू | यात्रा की व्यवस्था और सामग्री | travel arrangements and equipment |
2 नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।
English explanation
Following the preceptor’s counsel, the women and men of the city lived peacefully in Rama’s capital.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नगर | नगर के | of the city |
| नारि | स्त्रियाँ | women |
| नर | पुरुष | men |
| गुर | गुरु की | the preceptor’s |
| सिख | सीख; उपदेश | counsel; instruction |
| मानी | मानकर | having followed |
| बसे | रहने लगे | lived; settled |
| सुखेन | सुखपूर्वक | peacefully; comfortably |
| राम | राम की | Rama’s |
| रजधानी | राजधानी अयोध्या में | in the capital, Ayodhya |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.322
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 613
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 613, 613
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।