अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्द[देखा कि—] राजा सोचसे व्याकुल हैं, चेहरेका रंग उड़ गया है। जमीनपर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर (जड़से उखड़कर) [मुर्झाया] पड़ा हो। मन्त्री मारे डरके कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभसे भरी हुई और शुभसे विहीन कैकेयी बोली—॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 375 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।।
सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।
स्रोत अभिलेख 2.38 · पुस्तक पृ. 375, 376
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।।
English explanation
The king lay on the ground, distraught with worry and drained of color, like a lotus severed from its root.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोच | चिंता से | with worry |
| बिकल | व्याकुल | distraught |
| बिबरन | विवर्ण | pale, drained of color |
| महि | धरती पर | on the ground |
| परेऊ | पड़े थे | lay |
| मानहुँ | मानो | as though |
| कमल | कमल | a lotus |
| मूलु | अपनी जड़ | its root |
| परिहरेऊ | छोड़ चुका हो | had parted from |
2 सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।
English explanation
The frightened minister could not ask anything. Then Kaikeyi, filled with ill and devoid of good, spoke.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सचिउ | मंत्री सुमंत्र | the minister Sumantra |
| सभीत | भयभीत | afraid |
| सकइ | सकते थे | could |
| नहिं | नहीं | not |
| पूँछी | पूछना | ask |
| बोली | कैकेयी बोली | Kaikeyi spoke |
| असुभ | अशुभ से | with ill |
| भरी | भरी हुई | filled |
| सुभ | शुभ से | of good |
| छूछी | खाली | devoid |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.38
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 375
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 375, 376
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।