अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।।
मूल पाठ
सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।।
निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।।
स्रोत अभिलेख 2.266 · पुस्तक पृ. 565, 566
भावार्थ
मूल पाठ के बाददेवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओंकी सम्मति (आपसका विचार) और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजीको संकोच हुआ। भरतजीने अपने मनमें सब बोझा अपने ही सिर जाना और वे हृदयमें करोड़ों (अनेकों) प्रकारके अनुमान (विचार) करने लगे॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 565 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।।
English explanation
The supplied ‘सुनो’ means ‘listen’; the likely contextual sense is: on hearing the divine preceptor’s words and the gods’ counsel and concern, the Lord who knows all hearts felt constrained.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनो | सुनो | listen |
| सुरगुर | देवगुरु बृहस्पति की बात | the words of Brihaspati, preceptor of the gods |
| सुर | देवताओं की | of the gods |
| संमत | सम्मति; सलाह | counsel; considered opinion |
| सोचू | चिंता | concern |
| अंतरजामी | सबके मन की बात जानने वाले | knower of all hearts |
| प्रभुहि | प्रभु राम को | to Lord Rama |
| सकोचू | संकोच; धर्मसंकट | constraint; hesitation |
2 निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।।
English explanation
Bharata understood in his heart that this burden rested on his own head, and pondered it in countless ways.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपने | his own |
| सिर | सिर पर | on his head |
| भारु | भार; जिम्मेदारी | burden; responsibility |
| भरत | भरत ने | Bharata |
| जियँ | मन में | in his heart |
| जाना | समझा | understood |
| करत | करने लगे | began making |
| कोटि | करोड़ों; असंख्य | countless |
| बिधि | प्रकार से | in ways |
| उर | हृदय में | in his heart |
| अनुमाना | विचार; आकलन | reflections; assessments |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.266
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 565
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 565, 566
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।