अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।
मूल पाठ
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाही।।
स्रोत अभिलेख 2.292 · पुस्तक पृ. 587, 588
भावार्थ
मूल पाठ के बादमुनि वसिष्ठजीके वचन सुनकर जनकजी प्रेममें मग्र हो गये। उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्यको भी वैराग्य हो गया (अर्थात् उनके ज्ञान-वैराग्य छूट-से गये)। वे प्रेमसे शिथिल हो गये और मनमें विचार करने लगे कि हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं किया॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 587 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।
English explanation
Hearing the sage’s words, Janaka became absorbed in love. Seeing his state, even knowledge and detachment withdrew.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| मुनि | मुनि के | the sage’s |
| बचन | वचन | words |
| जनक | राजा जनक | King Janaka |
| अनुरागे | प्रेम में डूब गए | became absorbed in love |
| लखि | देखकर | seeing |
| गति | दशा | state |
| ग्यानु | ज्ञान | knowledge |
| बिरागु | वैराग्य | detachment |
| बिरागे | विरक्त होकर पीछे हट गए | withdrew in detachment |
2 सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाही।।
English explanation
Weakened by affection, he reflects inwardly: We did not do well to come here.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सिथिल | शिथिल; विवश | weakened; overcome |
| सनेहँ | स्नेह से | through affection |
| गुनत | विचार करते हुए | reflecting |
| मन | मन | mind |
| माहीं | के भीतर | within |
| आए | आकर | by coming |
| इहाँ | यहाँ | here |
| कीन्ह | किया | did |
| भल | अच्छा | well |
| नाही | नहीं | not |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.292
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 587
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 587, 588
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।