अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।
मूल पाठ
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।।
स्रोत अभिलेख 2.265 · पुस्तक पृ. 564, 565
भावार्थ
मूल पाठ के बादपहले देवताओंने बहुत समयतक दु:ख सहे। तब भक्त प्रह्लादने ही नृसिंहभगवान्को प्रकट किया था। सब देवता परस्पर कानोंसे लग-लगकर और सिर धुनकर कहते हैं कि अब (इस बार) देवताओंका काम भरतजीके हाथ है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 564 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।
English explanation
The gods endured distress for a long time, but it was Prahlada who brought about Narasimha’s manifestation.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहे | सहे | endured |
| सुरन्ह | देवताओं ने | the gods |
| बहु | बहुत | much; a long |
| काल | समय | time |
| बिषादा | दुःख | distress |
| नरहरि | नरसिंह, विष्णु का नर-सिंह रूप | Narasimha, Vishnu’s man-lion form |
| किए | किया; कराया | made; brought about |
| प्रगट | प्रकट | manifest |
| प्रहलादा | भक्त प्रह्लाद ने | Prahlada, the devotee, as agent |
2 लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।।
English explanation
Drawing close to one another’s ears and beating their heads, they say that the gods’ purpose now rests in Bharata’s hands.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लगि | पास जाकर | drawing close |
| लगि | बार-बार पास जाकर | repeatedly drawing close |
| कान | कान के पास | to the ear |
| कहहिं | कहते हैं | say |
| धुनि | पीटकर | beating |
| माथा | सिर | their heads |
| अब | अब | now |
| सुर | देवताओं का | the gods’ |
| काज | कार्य; प्रयोजन | purpose; undertaking |
| भरत | राम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| के | के | in his |
| हाथा | हाथ में; अधीन | hands; charge |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.265
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 564
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 564, 565
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।