अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं।
मूल पाठ
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं।
सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।।
स्रोत अभिलेख 2.265 · पुस्तक पृ. 564, 565
भावार्थ
मूल पाठ के बादफिर वे विचार करके आपसमें कहने लगे कि श्रीरघुनाथजी तो भक्तकी भक्तिके वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासाकी [घटना] याद करके तो देवता और इन्द्र बिलकुल ही निराश हो गये॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 564 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं।
English explanation
Reflecting again, they say to one another that Rama is won over by his devotees’ devotion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बहुरि | फिर | again |
| बिचारि | विचार करके | having reflected |
| परस्पर | आपस में | to one another |
| कहहीं | कहते हैं | say |
| रघुपति | रघुकुल के स्वामी राम | Rama, lord of Raghu’s lineage |
| भगत | भक्तों की | of his devotees |
| भगति | भक्ति | devotion |
| बस | के वश में | under the sway of |
| अहहीं | हैं | is |
2 सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।।
English explanation
Recalling the episode of Ambarisha and Durvasa, the gods and Indra became utterly disheartened.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुधि | स्मरण | recollection |
| करि | करके | having made |
| अंबरीष | भक्त राजा अंबरीष का | of the devotee-king Ambarisha |
| दुरबासा | ऋषि दुर्वासा का प्रसंग | the episode involving the sage Durvasa |
| भे | हो गए | became |
| सुर | देवता | the gods |
| सुरपति | देवराज इंद्र | Indra, lord of the gods |
| निपट | बिल्कुल | utterly |
| निरासा | निराश | disheartened |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.265
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 564
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 564, 565
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।