अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दतब रघुकुलके पुरोहित वसिष्ठजी समय, समाज और धर्मके अविरोधी (अर्थात् अनुकूल) वचन बोले। उन्होंने पहले जनकजी और भरतजीका संवाद सुनाया। फिर भरतजीकी कही हुई सुन्दर बातें कह सुनायीं॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 591 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।।
जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई।।
स्रोत अभिलेख 2.296 · पुस्तक पृ. 591, 591
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।।
English explanation
Then Vasishtha, priest of the Raghu lineage, spoke in a manner suited to the occasion and assembly, and consistent with dharma.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| समय | समय के | the occasion |
| समाज | सभा के | the assembly |
| धरम | धर्म के | dharma; righteous duty |
| अबिरोधा | विरुद्ध न होकर, अनुकूल | without conflicting with; consistent with |
| बोले | बोले | spoke |
| तब | तब | then |
| रघुबंस | रघुवंश के | of the Raghu lineage |
| पुरोधा | पुरोहित वसिष्ठ | Vasishtha, the family priest |
2 जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई।।
English explanation
He recounted the dialogue between Janaka and Bharata and related Bharata’s pleasing statement.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जनक | राजा जनक का | of King Janaka |
| भरत | भरत का | of Bharata |
| संबादु | संवाद | dialogue |
| सुनाई | सुनाकर | having recounted |
| भरत | भरत की | Bharata’s |
| कहाउति | कही हुई बात | statement |
| कही | कही | related |
| सुहाई | सुंदर, मनभावन | pleasing; admirable |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.296
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 591
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 591, 591
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