अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दकुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि कामका बनना-बिगडऩा सब भरतजीके हाथ है। इधर राजा जनकजी [मुनि वसिष्ठ आदिके साथ] श्रीरघुनाथजीके पास गये। सूर्यकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीने सबका सम्मान किया,॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 591 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।
गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।।
स्रोत अभिलेख 2.296 · पुस्तक पृ. 591, 591
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।
English explanation
AI draft: Having devised a deceitful scheme, Indra, king of the gods, worries that the success or failure of everything rests with Bharata.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करि | करके | having done |
| कुचालि | कपटपूर्ण चाल | a deceitful scheme |
| सोचत | सोच रहे हैं | is pondering |
| सुरराजू | देवराज इंद्र | Indra, king of the gods |
| भरत | राम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| हाथ | के हाथ में | in the hands of |
| सबु | सारा | all |
| काजु | कार्य का बनना | success of the undertaking |
| अकाजू | कार्य का बिगड़ना | failure of the undertaking |
2 गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।।
English explanation
Janaka went to Rama. Rama, the light of the solar dynasty, honored everyone.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गए | गए | went |
| जनकु | राजा जनक | King Janaka |
| रघुनाथ | राम | Rama, lord of the Raghu lineage |
| समीपा | के पास | near; into the presence of |
| सनमाने | सम्मान किया | honored |
| सब | सबका | everyone |
| रबिकुल | सूर्यवंश के | of the solar dynasty |
| दीपा | दीपक अर्थात राम | the light, namely Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.296
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 591
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 591, 591
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