अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।।
मूल पाठ
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।।
अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।
स्रोत अभिलेख 2.107 · पुस्तक पृ. 432, 432
भावार्थ
मूल पाठ के बादलाभकी सीमा और सुखकी सीमा [प्रभुके दर्शनको छोड़कर] दूसरी कुछ भी नहीं है। आपके दर्शनसे मेरी सब आशाएँ पूर्ण हो गयीं। अब कृपा करके यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें मेरा स्वाभाविक प्रेम हो॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 432 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।।
English explanation
There is no greater summit of gain or happiness; the sight of you has fulfilled all my hopes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लाभ | प्राप्ति, लाभ | gain; attainment |
| अवधि | परम सीमा | highest limit |
| सुख | सुख | happiness |
| अवधि | परम सीमा | highest limit |
| न | नहीं | not |
| दूजी | दूसरी | another |
| तुम्हारें | आपके | your |
| दरस | दर्शन से | through the sight of you |
| आस | आशाएँ | hopes |
| सब | सभी | all |
| पूजी | पूरी हुईं | were fulfilled |
2 अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।
English explanation
Now graciously grant this boon: a natural love for your lotus feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अब | अब | now |
| करि | करके | having shown |
| कृपा | कृपा | grace; kindness |
| देहु | दीजिए | please grant |
| बर | वरदान | boon |
| एहू | यह | this |
| निज | अपने, आपके ही | your own |
| पद | चरण | feet |
| सरसिज | कमल | lotuses |
| सहज | स्वाभाविक, सहज | natural; spontaneous |
| सनेहू | प्रेम | love |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.107
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 432
- सहायक विषय
- प्रयाग पहुँचना, श्रीराम-भरद्वाज-संवाद, यमुनातीरनिवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 432, 432
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।