अयोध्याकाण्ड · दोहा · दोहा/सोरठा
करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।
मूल पाठ
करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।
स्रोत अभिलेख 2.107 · पुस्तक पृ. 432, 432
भावार्थ
मूल पाठ के बादजबतक कर्म, वचन और मनसे छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तबतक करोड़ों उपाय करनेसे भी, स्वप्रमें भी वह सुख नहीं पाता॥ १०७॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 432 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।
English explanation
Until a person abandons deceit in deed, speech, and thought and becomes your servant—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करम | कर्म में | in deeds |
| बचन | वचन में | in speech |
| मन | मन में | in thought |
| छाड़ि | छोड़कर | having abandoned |
| छलु | कपट | deceit |
| जब | जब | when |
| लगि | तक | until |
| जनु | सेवक, भक्त | servant; devotee |
| न | नहीं | not |
| तुम्हार | आपका | yours |
2 तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।
English explanation
Until then, even countless efforts cannot bring happiness, not even in a dream.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| लगि | तक | until |
| सुखु | सुख | happiness |
| सपनेहुँ | स्वप्न में भी | even in a dream |
| नहीं | नहीं | not |
| किएँ | करने पर भी | even upon making |
| कोटि | करोड़ों, असंख्य | millions; countless |
| उपचार | उपाय, प्रयास | remedies; efforts |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा
- स्रोत अभिलेख
- 2.107
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 432
- सहायक विषय
- प्रयाग पहुँचना, श्रीराम-भरद्वाज-संवाद, यमुनातीरनिवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 432, 432
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।