अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।।
मूल पाठ
रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।।
एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।
स्रोत अभिलेख 2.114 · पुस्तक पृ. 438, 438
भावार्थ
मूल पाठ के बादकोई श्रीरामचन्द्रजीको देखकर ऐसे अनुरागमें भर गये हैं कि वे उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं। कोई नेत्रमार्गसे उनकी छविको हृदयमें लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणीसे शिथिल हो जाते हैं (अर्थात् उनके शरीर, मन और वाणीका व्यवहार बंद हो जाता है)॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 438 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।।
English explanation
Some, filled with love on seeing Rama, keep walking alongside him, gazing at him.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रामहि | राम को | Rama as the object of seeing |
| देखि | देखकर | having seen |
| एक | कुछ लोग | some people |
| अनुरागे | प्रेम में भर गए | became filled with love |
| चितवत | निहारते हुए | gazing |
| चले | चलते | walking |
| जाहिं | जाते हैं | keep going |
| सँग | साथ | alongside |
| लागे | लगकर; साथ हो लिए | having joined them |
2 एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।
English explanation
Some draw their image into the heart through their eyes, and their bodies, minds, and speech become subdued; the sense of ‘बर’ is uncertain.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एक | कुछ लोग | some people |
| नयन | नेत्रों के | of the eyes |
| मग | मार्ग से | through the pathway |
| छबि | सुंदर छवि | beautiful image |
| उर | हृदय में | into the heart |
| आनी | लाकर | having brought |
| होहिं | हो जाते हैं | become |
| सिथिल | शिथिल; निश्चेष्ट | subdued; still |
| तन | शरीर | body |
| मन | मन | mind |
| बर | सुंदर, उत्तम; यहाँ वाणी का विशेषण। | Beautiful or excellent; here qualifying speech. |
| बानी | वाणी | speech |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.114
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 438
- सहायक विषय
- यमुनाको प्रणाम, वनवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 438, 438
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।