अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।
मूल पाठ
रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।
भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो।।
स्रोत अभिलेख 2.317 · पुस्तक पृ. 609, 609
भावार्थ
मूल पाठ के बादश्रीरामजीकी कृपाने सारी उलझन सुधार दी। देवताओंकी सेना जो लूटने आयी थी, वही गुणदायक (हितकारी) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओंमें भरकर भाई भरतसे मिल रहे हैं। श्रीरामजीके प्रेमका वह रस (आनन्द) कहते नहीं बनता॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 609 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।
English explanation
AI draft: Through Rama’s grace, the deceitful device was turned to good; the gods’ sword-like scheme became a beneficial appeal.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रामकृपाँ | राम की कृपा से | through Rama’s grace |
| अवरेब | छलपूर्ण युक्ति | deceitful device |
| सुधारी | सुधर गई | was set right |
| बिबुध | देवताओं की | of the gods |
| धारि | तलवार; घातक चाल | sword; harmful scheme |
| भइ | हो गई | became |
| गुनद | हित देने वाली | beneficial |
| गोहारी | पुकार; प्रार्थना | appeal; plea |
2 भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो।।
English explanation
AI draft: As Rama embraced his brother Bharata, that sweetness of his love could not be expressed in words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भेंटत | मिलते; गले लगते हुए | while meeting; embracing |
| भुज | बाँहों में | in his arms |
| भरि | भरकर | holding fully |
| भाइ | भाई | brother |
| भरत | भरत को | Bharata, Rama’s brother |
| सो | से | with |
| राम | राम का | Rama’s |
| प्रेम | प्रेम | love |
| रसु | रस; मधुर अनुभूति | sweetness; emotional essence |
| कहि | कहा | expressed |
| न | नहीं | not |
| परत | जा सकता | can be |
| सो | वह | that |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.317
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 609
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 609, 609
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।