अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।
मूल पाठ
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।
नतरु लखन सिय सम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा।।
स्रोत अभिलेख 2.317 · पुस्तक पृ. 609, 609
भावार्थ
मूल पाठ के बादवह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवधिकी आशाके समान ही वह जीवनके लिये संजीवनी हो गयी। नहीं तो (उच्चाटन न होता तो) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सब लोग घबड़ाकर (हाय-हाय करके) मर ही जाते॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 609 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।
English explanation
AI draft: That malicious scheme turned out well for everyone: the hope of return after a fixed period sustained their lives.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह | that |
| कुचालि | बुरी चाल | malicious scheme |
| सब | सब लोगों | everyone |
| कहँ | के लिए | for |
| भइ | हो गई | became |
| नीकी | भली; हितकारी | good; beneficial |
| अवधि | निश्चित समय-सीमा | fixed period |
| आस | लौटने की आशा | hope of return |
| सम | के समान | like |
| जीवनि | जीवन देने वाली | life-giving sustenance |
| जी | प्राणों | life; vital spirit |
| की | की | of; for |
2 नतरु लखन सिय सम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा।।
English explanation
AI draft: Otherwise, everyone would have died in anguish from the grievous disease of separation from Lakshmana, Sita [and possibly Rama]; the reading ‘सम’ is uncertain.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नतरु | नहीं तो | otherwise |
| लखन | लक्ष्मण | Lakshmana, Rama’s brother |
| सिय | सीता | Sita, Rama’s wife |
| सम | राम; लक्ष्मण, सीता और राम के वियोग के प्रसंग में। | Rama, in the reference to separation from Lakshmana, Sita, and Rama. |
| बियोगा | वियोग | separation |
| हहरि | व्याकुल होकर | in anguish |
| मरत | मर जाते | would have died |
| सब | सभी | all |
| लोग | लोग | people |
| कुरोगा | भयंकर रोग से | from a grievous disease |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.317
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 609
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 609, 609
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।